जागेश्वर न्यूज नेटवर्क 

बरेली। गांधीपुरम में रह रहे सौरभ जैन का परिवार अयोध्या में हो रहे राम लला की प्राण प्रतिष्ठा से प्रसन्न है। परिवार की वरिष्ठ सदस्या हेमलता जैन बताती हैं कि राम मंदिर का ताला खुला था, तब उनके पति फैजाबाद में कार्यरत थे। परिवार जनों ने बताया कि उस समय फैजाबाद के नागरिकों ने निर्णय लिया था कि हर घर कम से कम 10 पैकेट पूरी और सूखी सब्जी के बनाएगा, कोई भी राम सेवक भूखा नही सोएगा।


इसके साथ ही उस समय महिलाओं का एक कार्य ओम लिखित झंडे घर में सिलने का भी होता था, जो विभिन्य संगठनों के माध्यम से वितरित किए जाते थे। आए दिन संचालन समिति राम मंदिर निर्माण शुरू न होने पर गिरफ्तारी की तारीख का दिन कभी पुरषों, कभी महिलाओं व कभी शिशु मंदिर के छात्रों हेतु तय किया करती थी और संबंधित उस दिन गिरफ्तारी देते थे। सभा स्थल के पास ही लगे कैम्प में कारसेवा करने आए लोगों का पंजीकरण किया जाता था। सौरभ जैन अपने बाल्य काल की घटना बताते हैं कि जब वो शिशु मंदिर के माध्यम से गिरफ्तारी देने गए तो पूरे स्कूल के बच्चों ने एक डेढ़ किलोमीटर की लंबी लाइन बना दी थी और एक तगारी से दूसरे को इस प्रकार से तगारिया, कभी कोई सामान सेवा स्थल तक पहुँचा कर, आयोजन समिति की योजना अनुसार, उनकी सहायता कर छात्र इस प्रकार से कारसेवा किया करते थे। परिवार जन बताते हैं आए दिन मंदिर निर्माण से जुड़े बड़े नेताओं के भाषण के समाचार मिलने पर लोग सुनने के लिये पैदल ही अयोध्या निकल लिया करते थे, जबकि फैजाबाद अयोध्या की लगभग पांच किलोमीटर की दूरी थी, जो कि काफी छोटी सी लगती थी। जय श्री राम के नारे से अभिवादन रास्ते में मिलने वाले हर अजनबी से करना, जो देश के विभिन्य हिस्सों से आए होते थे, हमारी भाषा अलग होती थी पर उत्साह एक होता था। परिवार जन आगे बताते हैं कि सभा स्थल से आगे बढ़ने पर मंदिर निर्माण से संबंधित बड़े बड़े स्तंभ व जयपुर आदि स्थानों से आये कारीगरों की बड़े-बड़े पत्थरों पर हथौड़ी और छैनी की टक्कर की आवाजों की मधुर ध्वनियां सुनाई देती थी। सभा स्थल से ही प्रशासन द्वारा हम सभी लोगों को तय समय के बाद, औपचारिक गिरफ्तारी के बाद बसों में बैठा कर के फैज़ाबाद के बस स्टैंड के आसपास छोड़ दिया जाता था।

परिवार जन आगे बताते हैं कि उन्हें आज भी याद है, उस समय रिश्तेदारों का भी आगमन इस उद्देश्य से होता था की विश्व में चर्चित उस स्थल को वो भी देखें। अयोध्या पांच तीर्थंकरों की भी जन्म स्थली है, तो उनका लगाव दुगना होना स्वाभाविक ही था।

1990 की यादों को भी बताते हुए परिवार जन कहते हैं की वो एक काला दिन था तमाम कारसेवकों के बलिदान के लिए उसे याद किया जाएगा। उस घटना के बाद उस घटना से संबंधित तमाम वीडियो कैसेट जगह जगह पर चला करती थी।

लोग कोठारी जैन बंधुओं का बलिदान को देख द्रवित हो जाया करते थे।

6 दिसंबर 1992 से पहले जब आयोजन कर्ताओं में सम्मिलित बड़े नेताओं ने सरयू से मिट्टी व पानी लेकर आने की बात कही तो लोगों ने इस बार कुछ ठोस कदम उठाने की बात कहकर नाराजगी भी व्यक्त की थी।

परिवार जन आगे बताते हैं कि मोहल्ले के लोग 4-5 दिसंबर तक ही अयोध्या जा पाए।

6 दिसंबर का दिन भी आज भी उन्हें याद है, फैजाबाद के लोगों को रोकने के लिए प्रशासन ने बैरिकेडिंग जगह जगह पर लगा दी थी। उस दिन तमाम तरह की अफवाहें देर शाम तक मिनट मिनट पर मोहल्ले वाले तमाम लोग फैजाबाद स्थित चौक तक जा कर लाते रहे। अयोध्या जाने वाले मार्ग पर फैजाबाद वासियों ने भी उस दिन प्रशासन को रोकने के लिये अवरोध उत्पन्न किया था। पूरे दिन सब काम छोड़ कर क्षेत्रवासी एक जगह एकत्रित रहे। सभी 1990 की यादों से सिहर उठते थे और अपने इष्ट देव को याद कर तमाम कार सेवकों व शहरवासियों के सुरक्षित रहने की कामना करते रहे। शाम को जब पुष्ट खबरों के साथ दिन समाप्त हुआ की बाबरी ढांचा विध्वंस हो गया है तो हम सब ने पूरे शहर वासियों के साथ दीपोत्सव मनाया।

स्थित सामान्य होने पर जब पुनः दर्शन को राम लला दरबार पहुँचे तो देखा विध्वंस स्थल पर छोटा-मोटा मलवा तो बचा ही नहीं था। लोग अपने साथ स्मृति के तौर पर ले जा चुके थे। मंदिर निर्माण में देरी का कारण परिवार जन आस्था के राजनीतिकरण को मानते हैं। जब परिवारजन उस शहर को छोड़कर आए तो बस रामलला से यही प्रार्थना करके आए कि हमें प्रभु अब तभी बुलाना जब हम आपको स्वयं मंदिर में विराजित देखें इस प्रकार से टाट के टेंट में नहीं और आपसे मिलने के आने के लिए यह 500 मीटर की जगह सर्पिल बैरिकेडिंग के कारण 10 किलोमीटर का रास्ता न तय करना पड़े।

आंखों में आसुओं के साथ परिवार की वरिष्ठ सदस्या हेमलता जैन कहती हैं की हमारे जीवन काल में भारत की संस्कृति, संस्कारों के संवाहक श्री रामलला अपने जन्मस्थली में विराजमान हो रहे हैं, यह हमारा सौभाग्य है।