भारत में प्राचीन भारतीय प्रथा योग के दर्शन ने समाज के कार्यों के विभिन्न पहलुओं को प्रभावित किया है, चाहे वह स्वास्थ्य और चिकित्सा हो या शिक्षा और कला जैसे क्षेत्र। मानसिक, आध्यात्मिक और शारीरिक भलाई के लिए शरीर और आत्मा के साथ मन को एकीकृत करने के आधार पर, योग के मूल्य समुदाय के लोकाचार का एक प्रमुख हिस्सा हैं।
मानव सभ्यता जितनी पुरानी है, उतनी ही पुरानी योग की उत्पत्ति भी मानी गयी है, ऐसा माना जाता है कि भारत में योग की उत्पत्ति लगभग 5000 साल पूर्व हुई थी। बहुत से पश्चिमी विद्वानों का मानना है कि योग की उत्पत्ति 5000 साल पूर्व नहीं, बल्कि बुद्ध (लगभग 500 ईसा पूर्व) के समय में हुई थी किन्तु हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि सिंधु घाटी की सबसे प्राचीन सभ्यता (पूर्व हड़प्पा काल ) की खुदाई के समय योग के ठोस प्रमाण भी प्राप्त हुए हैं जो पश्चिमी विद्वानों की सोंच पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करते हैं I इस प्राचीन सभ्यता के अस्तित्व वाले साबुन के पत्थर पर आसन की मुद्रा में बैठे योगी के चित्र उत्कीर्ण मिले हैं । मूल रूप से, योग की शुरूआत स्वयं के हित की बजाय पूरी मानव सभ्यता की भलाई के लिए हुई है और यही भारतीय संस्कृति का मूल भी है क्योंकि संपूर्ण विश्व में अकेली भारतीय संस्कृति ही एक ऐसी संस्कृति है जो “सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया,सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुख भागभवेत।“ का मन्त्र पूरी मानव सभ्यता को देती आयी है I वैदिक काल में एकाग्रता का विकास करने के लिए योगाभ्यास किया जाता था। पुरातन काल के योगासनों में और वर्तमान योगासनों में बहुत अन्तर है। इस काल में यज्ञ और योग का बहुत महत्व था। ब्रह्मचर्य आश्रम में वेदों की शिक्षा के साथ ही शस्त्र और योग की शिक्षा भी दी जाती थी।आधुनिक युग मे योगासनों को स्वास्थ्य विशेषज्ञ शारीरिक और मानसिक फिटनेस का मूल मंत्र मानते हैं। योगाभ्यास की आदत आपको शारीरिक रूप से सक्रिय बनाए रखने के साथ कई प्रकार के रोगों के जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है। सदियों से भारत में योगाभ्यास करके स्वास्थ्य लाभ प्राप्त किया जाता रहा है। विशेषज्ञ यहां तक दावा करते हैं कि जो लोग नियमित तौर से योगासनों का अभ्यास करते रहते हैं उनमें डायबिटीज और हृदय रोग जैसी तेजी से बढ़ती गंभीर बीमारियों का जोखिम भी कम होता है। अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स (एएपी) के अनुसार बच्चों और किशोरों में योग के अभ्यास की आदत बनाकर उनमें भावनात्मक, मानसिक, शारीरिक और व्यवहारिक स्वास्थ्य स्थितियों को मजबूत किया जा सकता है। योग, बच्चों को आत्मविश्वास बढ़ाने, काम पर ध्यान केंद्रित करने और समस्याओं को शांति से संभालने में मदद करने में पारंगत करते हैं। योगासनों के नियमित अभ्यास से मेरूदंड सुदृढ़ बनता है, जिससे शिराओं और धमनियों को आराम मिलता है। शरीर के सभी अंग-प्रत्यंग सुचारु रूप से कार्य करते हैं। प्राणायाम द्वारा प्राणवायु शरीर के अणु-अणु तक पहुंच जाती है, जिससे अनावश्यक एवं हानिप्रद द्रव्य नष्ट होते हैं, विषांश निर्वासित होते हैं- जिससे सुखद नींद अपने समय पर अपने-आप आने लगती है।
योगाभ्यासी अपने शरीर की देखभाल को अपना पवित्र कर्तव्य मानता है। योग द्वारा सच्चा स्वास्थ्य प्राप्त करना बिल्कुल सरल है। अच्छा स्वास्थ्य हर व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है। आज के प्रदूषित वातावरण में योग एक ऐसी औषधि है जिसका कोई साइड इफैक्ट नहीं है, बल्कि योग के अनेक आसन जैसे शवासन हाई ब्लडप्रैशर को सामान्य करता है, जीवन के लिए संजीवनी है अनुलोम-विलोम कपालभाति प्राणायाम, भ्रामरी प्राणायाम मन को शान्त करता है। वक्रासन हमें अनेक बीमारियों से बचाता है। आज कम्प्यूटर की दुनिया में दिनभर उसके सामने बैठे-बैठे काम करने से अनेक लोगों को कमर दर्द एवं गर्दन दर्द होना एक आम बात हो गई है, ऐसे में शलभासन तथा ताड़ासन हमें दर्द से छुटकारा दिलाते हैं। पवन मुक्तासन अपने नाम के अनुरूप पेट से गैस की समस्या को दूर करता है। गठिया की समस्या को मेरुदंडासन दूर करता है। योग में ऐसे अनेक आसन हैं जिनको जीवन में अपनाने से कई बीमारियाँ समाप्त हो जाती हैं और खतरनाक बीमारियों का असर भी कम हो जाता है। 24 घण्टे में से महज कुछ मिनट का ही प्रयोग यदि योग में उपयोग करते हैं तो अपनी सेहत को हम चुस्त-दुरुस्त रख सकते हैं। फिट रहने के साथ योग हमें सकारात्मक ऊर्जा भी देता है। योग से शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास होता है।
अतः यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि योग हमारे लिए हर तरह से आवश्यक है। यह हमारे शारीरिक, मानसिक और आत्मिक स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है। योग के माध्यम से आत्मिक सन्तुष्टि, शान्ति और ऊर्जावान चेतना की अनुभूति प्राप्त होती है जिससे हमारा जीवन तनावमुक्त तथा हर दिन सकारात्मक ऊर्जा के साथ आगे बढ़ता है। हमारे देश की ऋषि परम्परा से प्राप्त योग को आज विश्व भी अपना रहा है। गीता में योग के बारे में लिखा है, “योग स्वयं की स्वयं के माध्यम से स्वयं तक पहुँचने की यात्रा है।”
शालिनी मिश्रा, योग प्रशिक्षिका
राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय, मंडनपुर, बरेली।

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